मंदी रोकने के लिए प्रयास नाकाफी

प्रेम शर्मा

भारत को आर्थिक मंदी की चपेट से बचाने के लिए बैंकों द्वारा घटाई गई ब्याज दर का कोई लाभ नही दिख रहा है। ऐसे में अर्थ व्यवस्था के कई क्षेत्र से जो मंदी के संकेत है वह भारतीय अर्थव्यवस्था एवं जनमानस के लिए शुभ नही है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में उद्योग जगत को मिलने वाले कर्ज में 2.6 प्रतिशत की कमी आई है। 18 में से 16 उद्योग ऐसे है जिनमें कर्ज की रफ्तार में कमी आई है। ताजा रिपोर्ट के आधार पर कंज्यूमर गुड्स उद्योग के कर्ज में 8.3 प्रतिशत ओर आॅटों लोन में 0.9 प्रतिशत, सूक्ष्म लघु उद्योग में 2.5 और मझौले उद्योग में 1.2 प्रतिशत तो बड़े उद्योग के कर्ज लेने में 2.6 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। स्पष्ट है कि भारत सरकार की आर्थिक मंदी से निपटने के लिए बैंक ब्याज दरों में की गई कटौती न काफी है। सबसे ज्यादा चिन्तनीय यह कि रत्न से लेकर आभूषण निर्माण, चमड़ा, कागज से लेकर टैक्सटाइल जैसे तमाम उद्योगों ने कर्ज लेना कम कर दिया है। इसके परिणाम काफी घातक है। ये उद्योग न केवल देश के लिए निर्यात के लिए महत्वपूर्ण हैं बल्कि विदेशी पूजी का एक अहम माध्यम है। यही नही अधिकाधिक रोजगार के अवसर सृजन कराने वाले इन उद्योगों की सुस्ती से बेरोजगारी बढ़ रही है।यही नही भारतीय अर्थव्यवस्था पर नजर रखने वाली सीएमएमआईई के मुताबिक निजी क्षेत्र की तरफ से नई निवेश योजनाओं की रकम अभी देष के सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.5 प्रतिशत है।
बीते समय में रिजर्व बैंक ने कई बार ब्याज दरों में कटौती की है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नहीं दिख रहे हैं। इसका स्पष्ट अर्थ है कि भविष्य में आत्मविश्वास बढ़ने पर ही उपभोक्ता एवं निवेशक कर्ज लेते हैं। यानी सस्ता कर्ज स्वयं में अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का मंत्र नहीं है।फिलहाल दुनिया भर में ब्याज दरें घटाने की होड़ चल रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व पर दबाव बना रखा है कि हाल में की गई कटौती को जारी रखते हुए आगे भी ब्याज दरें घटाने पर काम करें। न्यूजीलैंड, थाईलैंड और भारत के केंद्रीय बैंकों ने भी पिछले महीने ब्याज दरों में कटौती की है। चीन ने आधिकारिक रूप से घोषणा नहीं की, परंतु माना जा रहा है कि वहां भी अंदरखाने ब्याज दरों में कटौती की गई है। ब्याज दरों में कटौती के पीछे सोच है कि ब्याज दर कम होंगी तो उपभोक्ता कर्ज लेकर बाइक अथवा टीवी खरीदेंगे जिससे बाजार में मांग बढ़ेगी। इसके साथ ही ब्याज दर न्यून होने से निवेशकों के लिए कर्ज लेकर फैक्ट्री लगाना आसान हो जाएगा और वे बाइक एवं टीवी बनाने के कारखाने लगाएंगे। इस प्रकार उपभोक्ता की मांग और निवेशक की आपूर्ति के बीच एक सही चक्र स्थापित हो जाएगा, लेकिन प्रश्न है कि क्या वास्तव में ऐसा होगा? इसकी पड़ताल के लिए हम अमेरिकी अर्थव्यवस्था का विश्लेषण कर सकते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिका द्वारा अपनाई गई नीतियों को ही दुनिया के तमाम देश अपनाते दिख रहे हैं। आर्थिक सर्वे के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी के तय किए हुए लक्ष्य तक पहुंचने के लिए देश के जीडीपी को हर साल 8 फीसदी की दर से बढ़ना होगा। देश की अर्थव्यवस्था में तरक्की की रफ्तार धीमी हो गई है। ऐसा पिछले तीन साल से हो रहा है। उद्योगों के बहुत से सेक्टर में विकास की दर कई साल में सबसे निचले स्तर तक पहुंच गई है। देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में पिछले तीन वित्तीय वर्षों से लगातार गिरावट आ रही है. 2016-17 में जीडीपी विकास दर 8.2 फीसद प्रति वर्ष थी, तो 2017-18 में ये घटकर 7.2 प्रतिशत रह गई. और, वर्ष 2018-19 में जीडीपी की विकास दर 6.8 फीसद ही दर्ज की गई। बीते तीन साल में विकास की रफ्तार में 1.5 प्रतिशत की कमी (8.2 प्रतिशत से 6.8 प्रतिशत) बहुत बड़ी कमी है. जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी, खपत, बचत और निवेश, सब पर असर पड़ रहा है. जिन सेक्टरों पर इस मंदी का सबसे ज्यादा असर पड़ा है, वहां पर नौकरियां घटाने के एलान हो रहे हैं। विकास दर घटने से लोगों की आमदनी पर बुरा असर पड़ा है. तो, अब लोग अपने खर्चों में कटौती कर रहे हैं। देश में बाजार की सबसे बड़ी रिसर्च कंपनी नील्सन की एक रिपोर्ट कहती है कि तेजी से खपत वाले सामान यानी फास्ट मूविंग कंजंप्शन गुड्स की बिक्री की विकास दर इस साल जनवरी से मार्च के बीच 9.9 प्रतिशत थी। लेकिन, इसी साल अप्रैल से जून की तिमाही में ये घटकर 6.2 फीसद ही रह गई। ग्राहकों की खरीदारी के उत्साह में कमी का बड़ा असर ऑटो उद्योग पर पड़ा है. बिक्री घटी है. तो नौकरियों में बड़े पैमाने पर कटौती की जा रही है. सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स के आंकड़ों पर गौर करें, तो हर तरह के वाहन की बिक्री में गिरावट आई है। इस सेक्टर के विकास में पिछले एक साल से लगातार गिरावट ही देखी जा रही है।बिक्री में गिरावट से निपटने के लिए गाड़ियों के खुदरा विक्रेता अपने यहां नौकरियों में कटौती कर रहे हैं। देश भर में गाड़ियों के कघ्रीब 26 हजार शो रूम हैं, जिन्हें 15 हजार के आस-पास डीलर चलाते हैं. इन शो रूम में करीब 25 लाख लोगों को रोजगार मिला हुआ है. डीलरशिप की इस व्यवस्था में अपरोक्ष रूप से करीब 25 लाख और लोगों को भी रोजगार मिला हुआ है। अर्थव्यवस्था का विकास धीमा होने का रियल एस्टेट सेक्टर पर भी बहुत बुरा असर पड़ा है. बिल्डरों का आकलन है कि इस वक्त देश के 30 बड़े शहरों में 12.76 लाख मकान बिकने को पड़े हुए हैं। उनके बिकने में पांच से सात बरस लग सकते हैं।आम तौर पर जब घरेलू बाजार में खपत कम हो जाती है, तो भारतीय उद्योगपति, अपना सामान निर्यात करने और विदेश में माल का बाजार तलाशते हैं. लेकिन, अभी स्थिति ये है कि विदेशी बाजार में भी भारतीय सामान के खरीदारों का विकल्प बहुत सीमित रह गया है। अगर अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल हों, तो इसका असर विदेशी निवेश पर भी पड़ता है. अप्रैल 2019 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 7.3 अरब डॉलर था. लेकिन, मई महीने में ये घट कर 5.1 अरब डॉलर ही रह गया।रिजर्ब बैंक के मुताबिक, देश में आ रहा कुल विदेशी निवेश, जो शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट में निवेश किया जाता है, वो अप्रैल में 3 अरब डॉलर था. पर, मई महीने में ये घटकर 2.8 अरब डॉलर ही रह गया।इन सभी बातों का निष्कर्ष ये है कि देश की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है। निर्माण क्षेत्र में कमी आ रही है। कृषि क्षेत्र का संकट बरकघ्रार है. किसानों की आमदनी बढ़ नहीं रही है. निर्यात भी जस के तस हैं. बैंकों और वित्तीय संस्थानों की हालत खराब है. और रोजगार के क्षेत्र में बड़ा संकट पैदा हो रहा है। हमारे देश की अर्थव्यवस्था की बुनियादी संस्थागत कमियों को दूर करने के लिए अच्छे नीयत वाली आर्थिक नीतियों की जरूरत है। लेकिन काबिल अर्थशास्त्री, मोदी सरकार से दूर जा रहे हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए वैसे जरूरी कदमों की उम्मीद नहीं दिखती. मोदी सरकार के दौरान, इला पटनायक, रघुराम राजन, उर्जित पटेल, अरविंद पनगढ़िया, अरविंद सुब्रमण्यम और विरल आचार्य जैसे काबिल अर्थशास्त्रियों की विदाई हो गई।पिछले कई दशकों में ऐसा पहली बार है जब वित्त मंत्रालय में ऐसा कोई आईएएस अधिकारी नहीं है, जिसके पास अर्थशास्त्र में पीएचडी की डिग्री हो. और जो अर्थव्यवस्था की बढ़ती चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार को नीतियां बनाने में मदद कर सके।