असमय छिपना एक ‘अरुण’ का !

डॉ0 घनश्याम बादल
लगता है कि अगस्त का महिना भारतीय जनता पार्टी पर भारी पड़ता है । पिछले साल 16 अगस्त को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हुआ इसी वर्ष उसकी प्रखर नेता सुषमा स्वराज अल्पायु में ही दिवंगत हुई और कल 24 अगस्त को पार्टी के संकटमोचक कहे जाने वाले अरुण जेतली का एम्स में महज 67 साल की उम्र में निधन हो गया ।
दिवंगत अरुण जेतली भाजपा के उन सक्षम नेताओं में से एक थे जिन पर पार्टी हर संकट के समय निर्भर करती थी । 1952 में 28 दिसंबर को जन्मे अरुण जेतली छात्र जीवन से ही राजनीति में आ गए थे विद्यार्थी परिषद के सक्रिय कार्यकर्ता रहते हुए वें तत्कालीन जनता पार्टी से जुड़े । कानून की पढ़ाई करने के बाद अपनी रुचि के क्षेत्र वकालत में आए और जल्दी ही देश के नीमी वकीलों में शुमार हो गए । 1991 में भाजपा में पार्टी के महासचिव बनने के बाद से ही राष्ट्रीय राजनीति के अभिन्न अंग बने और अंतिम संास लेने तक भाजपा ही नहीं देश की रानजीति की एक मजबूत धुरी बने रहे ।
अरुण जेतली के विरोधी अक्सर उन पर हवाई नेता हाने के आरोप लगाते थे उनके अनुसार उनकी आम आदमी पर पकड़ नहीं थी और वें संसद में इसी वजह से राज्य सभा के रास्ते प्रवेश पाते थे । पर , अरुण जेतली में कुछ ऐसी खासियत थी कि 1914 में अमृतसर से कैप्टन अमरिंदर सिंह से चुनाव में हार जाने के बाद भी उन्हे न केवल केंद्रीय मंत्रीमंडल में शामिल किया गया अपितु वित्त मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग भी दिया गया और अरुण जेतली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उन पर दिखाए गए विश्वास पर 24 कैरेट सोने की तरह खरे उतरे ।
1914 में अरुण जेतली केंद्रीय मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल नहीं हुए थे अपितु अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में भी सूचना व प्रसारण मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाल कर अपनी योग्यता को लोहा मनवा चुके थे । यह अरुण जेतली की काबिलियत ही थी कि उन्हें वक्त – वक्त पर वाणिज्य , कॉरपोरेट और रक्षा मंत्रालय जैसे विभाग सौंपे गए एक समय तो ऐसा भी आया कि वें वित्त व रक्षा दोनो मंत्रालयों के मंत्री रहे और दोनों भारी भरकम मंत्रालयों को उन्हानें पूरी दक्षता से संभाला ।
अरुण जेतली का व्यक्तित्व बहुआयामी था वें केवल एक राजनेता भर नहीं थे अपितु एक बहुप्रतिष्ठित अधिवक्ता, क्रिकेट प्रशासक होने के साथ ही एक व्यवहारिक प्रबंधक या कहिए कि एच आर मैनेजर भी थे । मीड़िया पर उनकी जबर्दस्त पकड़ थी अक्सर मज़ाक में मीड़िया क्षेत्र के विश्लेषक उन्ह्रे कई अखबारों व पत्रिकाओं के प्रछन्न संपादक कहा करते थे इसकी वजह थी कि वें मीड़िया के गहन जनाकार थें । अनेकों अखबार व चैनल मालिकों से उनके घनिष्ठ संबंध थे और वें वहां के प्लेटफॉर्म पर अपने व अपनी पार्टी के अनुकूल खबरें चलवाने में कामयाब रहते थे इसका लाभ उन्हें सरकार में मंत्री रहते हुए व सरकार से बाहर विपक्ष में पहते हुए भी मिलता रहा ।
अरुण जेतली के व्यक्तित्व की एक और खास बात भी अपनी पार्टी पर पकड़ रखने के साथ ही विपक्षी खेमे में भी उनके चाहने वाले हर समय मौजूद रहे । भाजपा के कट्टर व पक्के विचारधारा वाहक होने के बावजूद भी कांगे्रस व कम्यूनिस्ट पार्टियों तक में अरुण जेतली का अच्छा खासा प्रभाव था और इसी प्रभाव के चलते वें संसद के अंदर व बाहर भाजपा व सरकार के संकट मोचक बनने में कामयाब रहते थे । राजनीति की सारी कड़वाहट को एक तरफ रख कर अरुण जेतली व्यक्तिगत संबंध बनाने के हुनर के उस्ताद थे । एक समय ऐसा आया जब उनके प्रबल विरोधी अरविंद केजरीवाल ने उन पर भ्रष्टचार के गंभीर आरोप लगाए तो शांत स्वभाव के अरुण जेतली भी तिलमिला उठे और उन्होनें उन पर सौ करेाड़ रुपए का मानहानि का केस ठोक दिया । कोर्ट में जाते ही अरविंद कंजरीवाल समझ गए कि मामला पेचीदा है और प्रखर वक्ता व वकील अरुण जेतली के सामने उनका टिकना संभव ही नहीं है तो उन्होने अरुण जेतली से सार्वजनिक रूप से माफी मांग कर जान बचाई और अरुण जेतली ने बड़ दिल दिखाते हुए तुरंत ही न केवल उन्हे माफ कर दिया अपितु केस भी वापस ले लिया और जब दिलली के मुख्यमंत्री केक रूप में उनकी मदद चाही तो नियमानुसार अरुण जेतली ने उन्हे उचित फंड उपलब्ध कराया ।
अरुण जेतली राजनीति की गहरी समझ ही नहीं रखते थे अपितु उनमें गज़ब की दूरदृष्टि थी । 1991 के वाजपेयी सरकार के केंद्र में रहते नरेंद्र मोदी गुजारत के मुख्यमंत्री बने और फिर उसी कार्यकाल में विवदास्पद गोधरा कोड हुआ तब विपक्ष के हमलों से बेचैन अटल ने उन्हे राजधर्म निबाहने की सलाह दी थी और जब हालात काबू में नहीं आए तो तत्कालीन गृहमंत्री व तब की भाजपा के सरदार पटेल कहे जाने वाले लालकृष्ण अड़वाणी उनके खिलाफ कार्यवाही करने का मन बना चुके थे ऐसे में अरुण जेतली ही तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बचाने में कामयाब हुए । अरुण जेतली ने एक नहीं अनेकों बार अमित शाह व मोदी की जोड़ी को संकटकाल से बाहर निकाला जिसका इनाम उन्हे चुनाव हार जाने के बाद भी वित्तमंत्री के रूप में चुने जाने के रूप में मिला ।
अरुण जेतली पक प्रखर वक्ता थे उनमें गज़ब की तर्क शक्ति थी । राफेल सौदे में जब राहुल गांधी लगातार मोदी सरकार की बखिया उधेड़ रहे थे और जनता को उस सरकार के भ्रष्ट होने तथा राफेल सौदा ज्यादा कीमत में करने के आरोप लगा रहे थे । एक दिन तो वें संसद में एक सी ड़ी दिखाने पर भी अड़े हुए थे जिससे उनके मुताबिक उनके आरोप सिद्ध होने वाले थे पर अरुण जेतली ने संसद में ऐसे आंकड़े पेश किए कि राहुल व विपक्ष की बोलती बंद कर दी और जिस राफेल सौदे के भ्रष्टाचार को जनता के बीच ले जाकर वें चुनाव में कांगे्रस के जीतने के सपने देख रहे थे उसकी अरुण जेतली ने एक ही मिनट में हवा निकाल दी । वह अरुण जेतली ही थे जिन्होने तमाम विरोधों के वावजूद देश में जी एस टी लागू कर दिया और केंद्र के साथ ही राज्य सरकारों की भी आय में वृद्धि करने में सफलता पाई तथा एक ‘देश एक टैक्स’ लाने का श्रेय मोदी सरकार के खाते में लिया गए ।
पुलवामा हमले के बाद भी अरुण जेतली सर्जिकल स्ट्राइक करने की योजना में मुख्य स्तंभ रहे तथा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह अमित शह व प्रधानमंत्री के साथ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मोर्चा संभालते रहे । अरुण जेतली समय समय पर न केवल अने मंत्रालय अपितु दूसरे मंत्रालयों के भी विपक्ष के हमले में फंसने पर सरकार के लिए ढाल बनकर खड़े रहते थे ।
भले उम्र अधिक नहीं थी पर राजनीति , वकालत क्रिकेट और दूसरी व्यस्तताओं के बाद भी वें कविता के लिए भी समय निकाल लेते थे उन्हाने पांच बजट लगातार पेश किए और उनके हर बजट में उत्कृष्ट श्रेणी की शेरो शायरी व कविताएं मौजूद रहती थी । इतने सारे दबावों व अपने लिए समय न निकालपाने की वजह से उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा तथा उन्होने गत वर्ष ही किड़नी का प्रत्यारोपण कराया था फिर उनके पैर में सोफ्ट सैल कैंसर के लक्ष्ण भी पाए गए इतनी सारी स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं के चलते ही उन्होने गत लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा और चिट्ठी लिखकर प्रधानमंत्री से उन्हे मंत्रिमंडल में न लेने की गुजारिश की जिसे न चाहते हुए भी मोदी को मानना पड़ा । गत नौ अगस्त को ही वें एम्स में दाखिल हुए थे ओर 24 अगस्त आते – आते वरिष्ठ चिकित्सकों की हर संभव कोशिश के बावजूद भी उन्हे बचाया नहीं जा सका ।
टाने वले समय में अरुण जेतली को एक प्रतिभा संपन्न , तेजतर्रार , दूरदर्शी और तर्कशील रानीतिज्ञ के साथ ही बेहतरीन इंसान , व्यवहारिक व्यक्ति , संबंधों के कुशल खिलाड़ी और खिलाड़ियों के संरक्षक व हितैषी प्रशासक के रूप याद किया जाएगा और देश के साथ ही भाजपा उनकी कमी खास तौर पर महसूस करेगी ।
डॉ0 घनश्याम बादल

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