क्यों जरूरी है पर्यावरण आधारित विकास की

Why is it necessary for environment-based development

Why is it necessary for environment-based development
Why is it necessary for environment-based development

-ललित गर्ग-
पर्यावरण एवं प्रकृति की दृष्टि से हम बहुत ही खतरनाक दौर में पहुंच गए हैं क्योंकि संभव है कि मानव की गतिविधियां ही इसके विनाश का कारण बन जाएं। आज के दौर में समस्या प्राकृतिक संसाधनों के नष्ट होने, पर्यावरण विनाश एवं प्राकृतिक आपदाओं की हैं। सरकार की नीतियां, उपेक्षाएं एवं विकास की अवधारणा ने ऐसी स्थितियों को खड़ा कर दिया है कि सरकार की बजाय न्यायालयों को बार-बार अपने डंडें का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। जोशीमठ एवं चंडीगढ़ ऐसी ही स्थितियों के ताजे गवाह बने हैं। जोशीमठ की भूमि में पड़ी दरारे एक बड़ी त्रासदी के साथ वहां रहने वाले लोगों के जीवन-संकट का कारण बनी है। यह पर्यावरण एवं प्रकृति की उपेक्षा एवं तथाकथित अनियोजित विकास का परिणाम है, ऐसे ही अनियोजित विकास के कारण चंडीगढ़ जैसे महानगर किसी बड़े संकट को भविष्य में झेलने को विवश न हो, इसके लिये चंडीगढ़ में रिहाइशी इलाकों के स्वरूप में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है, वह दूरगामी महत्त्व का है।

यह न सिर्फ चंडीगढ़ को एक विरासत के रूप में बचाने की फिक्र है, बल्कि एक तरह से विकास के नाम पर चलने वाली उन गतिविधियों पर भी टिप्पणी है, जिसकी वजह से कोई शहर आम जनजीवन से लेकर पर्यावरण तक के लिहाज से बदइंतजामी का शिकार हो जाता है। आधुनिक राजसत्ताओं को पर्यावरण की दुश्मन माने तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। आर्थिक एवं भौतिक तरक्की अक्सर प्रकृति एवं पर्यावरण के विनाश का कारण बनती रही है। हमें विकास की कार्ययोजनाएं पर्यावरणीय आधारित बनानी होगी।

आज देश ही नहीं, दुनिया में जोशीमठ में खड़े हो रहे व्यापक प्राकृतिक आपदा के संकट से जुड़े सवाल चर्चा का कारण बने हुए है। इस संकट के मद्देनजर वहां के लोगों की मुश्किलों को समझा जा सकता है। लेकिन स्थानीय स्तर पर जिस तरह का संकट पैदा हुआ है, उसमें प्राथमिक स्तर पर वहां की सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इसका तात्कालिक और दीर्घकालिक समाधान निकालें। सबसे बड़ी जरूरत है कि जोशीमठ की स्थितियों से सबक लेते हुए सरकार विकास के स्वरूप पर चिन्तन करें। वर्त्तमान में मानव की गतिविधियों से जितनी मिट्टी, पत्थर और रेत अपनी जगह से हटाई जाती है, वह सभी प्राकृतिक कारणों से हटने वाली कुल मात्रा से बहुत अधिक है।

हरेक वर्ष जितने कंक्रीट का उत्पादन किया जाता है उससे पूरी पृथ्वी पर 2 मिलीमीटर मोटी परत चढ़ाई जा सकती है। प्लास्टिक का उत्पादन कुछ वर्षों के भीतर ही इतना किया जा चुका है कि इसके अवशेष माउंट एवरेस्ट से लेकर मरिआना ट्रेंच-महासागरों में सबसे गहराई वाला क्षेत्र तक मिलने लगा है। विश्व के आधे पेड़ काटे जा चुके हैं, और बहुत बड़ी संख्या में प्रजातियां मानव की गतिविधियों के कारण विलुप्त हो रही हैं। वायुमंडल से प्राकृतिक कारणों से जितनी नाइट्रोजन हटती है, उससे अधिक औद्योगिक उत्पादन, विकास कार्यों और कृषि से हट जाती हैं।

जोशीमठ में खड़ी हुई प्राकृतिक आपदा एकाएक नहीं हुई है, इस प्राकृतिक संकट को महसूस करते हुए वहां हो रहे भूस्खलन और धंसाव की समस्या को लेकर पिछले पचास वर्षों में कई अध्ययन कराए गए, लेकिन उनकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वैज्ञानिकों ने हर बार आगाह किया, लेकिन इसके बाद भौगोलिक-तकनीकी अध्ययन कराने की ओर से आंखें फेर ली गई़़। असल में सरकारें न केवल जोशीमठ बल्कि सर्वत्र प्राकृतिक संकटों के समाधान की दिशा में कोई कदम उठाने की बजाय ऐसी ही उपेक्षा एवं उदासीनता बरती है। जोशीमठ एवं अन्य पहाड़ी क्षेत्रों के मसलों को छोटा मत मानिये। ये ऐसे मसले हैं जो आने वाले वक्त में पर्यावरण एवं प्रकृति के साथ-साथ जन-विनाश के साथ सामाजिक एवं आर्थिक स्थितियों को काफी हद तक प्रभावित करेंगे।

जोशीमठ के आम जनता को यह हक है कि वह सबसे पहले अपने ऊपर सीधे असर करने वाले इन संकटों के लिये जागरूक होकर स्थानीय स्तर पर उन संस्थाओं से अपनी जिम्मेदारी निभाने की मांग करें, जिन्हें लोकतंत्र में इसी काम के लिए बनाया गया है। दरअसल, जोशीमठ त्रासदी ने लोकतंत्र के इन स्तंभों को लेकर जो सवाल खड़े किए हैं, उन्हें समझने की जरूरत है। विकास एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है, हालांकि हर विकास के अपने सकरात्मक और नकरात्मक नतीजे होते है। लेकिन जब पहाड़ी निवासियों के लाभ के लिए विकास किया जा रहा हो, तो पर्यावरण का ख्याल रखना भी उतना ही जरुरी है। अगर बिना पर्यावरण की परवाह किये विकास किया गया तो पर्यावरण पर इसके नकरात्मक प्रभाव उत्पन्न होंगे, जिससे यह उस स्थान पर रहने वाले निवासियों पर भी हानिकारक प्रभाव डालेगा।

जनहानि की व्यापक संभावनाओं के साथ-साथ सम्पूर्ण विनाश की आशंकाएं रहती हैं। सतत विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, यह काफी जरूरी है कि हम पर्यावरण की सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम उठायें। इस तरीके से यह सिर्फ ना वर्तमान के जनसंख्या के लिए लाभकारी होगा बल्कि भविष्य की आने वाले पीढ़ियां भी इसका लाभ ले सकेंगी और यही सतत एवं सकारात्मक विकास का मुख्य लक्ष्य है। इसलिए सतत विकास का पर्यावरणीय आधार अहम है। इसी बात की गहराई को समझते हुए चंड़ीगढ की विरासत एवं भविष्य के पर्यावरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अपना दखल दिया है।

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गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ शहर के फेज एक में एकल आवासीय इकाइयों को मंजिल आधारित अपार्टमेंट में बदलने पर रोक लगा दी है। अब इस इलाके में एक समान अधिकतम ऊंचाई के साथ मंजिलों की संख्या तीन तक सीमित रहेगी। चंडीगढ़ में जिस स्वरूप में इमारतों का निर्माण कराया, वे आमतौर पर एक अलग संदेश देती हैं। मगर अफसोस की बात यह है कि वक्त के साथ इन इमारतों में भी सुविधा के मुताबिक कई तरह के बदलाव किए गए। जाहिर है, इस तरह के बदलाव केवल सीमित असर नहीं डाल रहे थे, बल्कि विस्तृत होकर शहर के ढांचे एवं पर्यावरण पर भी प्रभाव डालने वाले थे। इसी क्रम में सन 2001 में एक नियम के तहत चंडीगढ़ में आवासीय भूखंडों को अपार्टमेंट के रूप में निर्माण या उपयोग करने की इजाजत दे दी गई थी।

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अन्य महानगरों में भी पिछले कुछ दशकों से शहरों में विकास के नाम पर जिस तरह की बेलगाम गतिविधियां चल रही हैं, उसके मद्देनजर इस फैसले को दरअसल देश के पहले नियोजित शहर चंडीगढ़ की विरासत को बचाने  के साथ अन्य महानगरों के लिये जागरूक हो जाने की दिशा में एक बड़ा कदम कहा जा सकता है। अदालत ने भी इसकी अहमियत का जिक्र करते हुए कहा कि यह रोक चंडीगढ़ की विरासत की स्थिति के साथ-साथ स्थिरता के मद्देनजर जरूरी है; सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक ‘उचित संतुलन’ बनाने की भी आवश्यकता है।

सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच उचित संतुलन बनाने के प्रयास किये होते तो जोशीमठ का संकट खड़ा नहीं होता। उपचारात्मक कार्य नहीं हो पाए और आज स्थिति सबके सामने है। पुराने भूस्खलन क्षेत्र में बसे जोशीमठ में पूर्व में अलकनंदा नदी की बाढ़ से भू-कटाव हुआ था। साथ ही घरों में दरारें भी पड़ी थीं। वर्ष 1976 से लेकर 2022 तक की अनेक अध्ययनों की संस्तुतियों में जोशीमठ क्षेत्र का भूगर्भीय सर्वेक्षण, भूमि की पकड़, धारण क्षमता, पानी के रिसाव के कारण समेत कई अध्ययन कराने की जरूरत बताई गई।

वैज्ञानिकों के अनुसार जोशीमठ सिस्मिक जोन पांच में आता है और भूकंप व भूस्खलन की दृष्टि से काफी संवेदनशील स्थान है। इन तथ्यों को लेकर राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) की तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना और हेलंग बाईपास का निर्माण कार्य को लेकर सवाल उठते रहे। अब जबकि जोशीमठ में पानी सिर से ऊपर बहने लगा है और हाल में वैज्ञानिकों के दल ने दोबारा सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपी है, तब जाकर सरकार की नींद टूटी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस संकट को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग करते हुए कहा गया है कि ‘मानव जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र की कीमत पर कोई भी विकास नहीं होना चाहिए।

भारतीय संविधान विश्व का पहला संविधान है जिसमें पर्यावरण संरक्षण के लिए विशिष्ट प्रावधान है। पर्यावरण से संबंधित समस्याओं और मसलों पर भारत सरकार ने अनेक प्रयत्न एवं नीतियां लागू करते हुए जोखिमों को कम करने एवं सामने आने वाले संकटों के समाधान के लिये तैयारी की है, लेकिन इन तैयारियों की नाव में छिद्र होना, संकट को कम करने की बजाय बड़ा कर रहा है।

प्रेषकः
(ललित गर्ग)
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ई-253, सरस्वती कंुज अपार्टमेंट
25 आई. पी. एक्सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्ली-92
मो. 9811051133

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