मोदी जी अपनी पार्टी के भी भ्रष्टाचारियों पर कुछ करें…!

नईम कुरेशी 9893233669
प्रधानमंत्री मोदी पिछले 6 सालों से देश के प्रतिष्ठित व लोकप्रिय नेता बने हुए हैं। चाय बेचकर भारत की सियासत में आगे बढ़ने वाले वो एक पिछड़े वर्ग के बड़े नेता एकाएक कब बन गये किसी को पता भी नहीं चला। इस गांधी नेहरू के देश में पटेल के देश में डॉ. अम्बेडकर के देश में अब्दुल कलाम आजाद के देश में गांधी नेहरू को छोड़ सबको भुला दिया गया। दलित, पिछड़े हाशिये पर फेंक दिये गये। चारों तरफ तिवारी, त्रिपाठी, शुक्ल, मिश्रा व शर्मा जी छा गये थे। ये सब 1990 तक 42-44 सालों तक खूब हुआ पर उत्तर प्रदेश के दलित पिछड़ों व कुछ हद तक मुस्लिम वर्ग के लोगों ने मुलायम सिंह यादव उनकी पार्टी के साथ हाथ मिलाकर इन कथित गांधीवादियों से उत्तर प्रदेश को मुक्त कराने में सफलता पा ली। सब जानते हैं यू.पी. से होकर ही दिल्ली में सत्ता पाई जाती है।

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भारत के एक शायर ने इन लोगों पर लिखा है कि- ”लीडर को रंज तो बहुत है पर आराम के साथ“। ऐसी ही कांग्रेस पार्टी रही है। उसके आला कमान ने इन्द्रा गांधी के बाद राजीव गांधी जैसे शानदार राजकुमार को सत्ता सौंपी गई जहां उनके छोटे भाई संजय गांधी की खूब तूती बोलती थी। उत्तर प्रदेश व हरियाणा के नारायणदत्त तिवारी व बंसीलाल, म.प्र. के विद्याचरण शुक्ल आदि संजय को चप्पलें पहनाते देखे जाते थे। तिवारी जी के बारे में सब जानते हैं कितने रसिया नेता रहे थे। सत्ता की खूब गहराई से भोगने वाले न.द. तिवारी को कांग्रेस का आइडल कहा जा सकता है। इन सब लोगों की करतूतों ने ही शायद कांग्रेस की गैर इरादतन हत्या जैसी कर दी। गांधी का नाम तो खुद इन्द्रा गांधी 1980-90 के दशक में बेच ही चुकी थीं। आधी से ज्यादा पार्टी को राजा महाराजाओं को सौंप चुकी थीं क्योंकि उन्हें अपने राज्यों के सूबेदार अच्छे नहीं लगते थे।
कांग्रेसी दलितों के विरोधी हैं?
कांग्रेस का विकल्प बने जनसंघ से भारतीय जनता पार्टी ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया साहेबा का खास अहम रोल रहा। उन्होंने ग्वालियर के पूर्व महापौर व सांसद राज्यसभा रहे नारायणकृष्ण शेजवलकर जी व इन्दापुरकर ने राजमाता साहब को घेरकर उनके संसाधन से कुशाभाई ठाकरे पटवा जी आदि के सहयोग से भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करवा दिया था। उस दौर में कम्युनिष्टों के साथ कांग्रेसी प्रकाशचन्द्र सेठी की अगुआई में ग्वालियर अंचल में संघ परिवार से मुकाबला कर रहे थे पर मुझे एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता जो विद्याचरण शुक्ल के खास समर्थक रहे थे शर्मा जी ने बताया कि उस दौर के दलित नेता व सेठी मंत्रीमंडल में राज्यमंत्री रहे राजा रामसिंह जो एक भले इंसान थे, मुख्यमंत्री सेठी ने उन्हें एकाएक मंत्री मंडल से बर्खास्त कर दिया। उसके बाद इस इलाके में दलित नेता कोई उठ ही नहीं पाया। कांग्रेसियों के इस पाप या नादानी कहें से उसे काफी नुकसान हुआ। ग्वालियर में डॉ. रघुनाथ पापरीकर इन्दापुरकर मधुमइया शीतलासहाया जमीन से जुड़े नेता रहे थे। पापरीकर अभी 4 सालों पूर्व ही 99 साल की उम्र में शांत हुए हैं। कांग्रेस में डोंकर सिंह कक्का, राजेन्द्र सिंह जी गांधी वाद व गांधी का नाम लेने वाले आखिरी जननेता रहे अशोक सिंह उनके पुत्र कांग्रेस की तरफ से लोकसभा प्रत्याशी 4 बार रहे थे। राधौगढ़ के राजा दिग्विजय सिंह व रेलमंत्री रहे माधवराव सिंधिया जी इसी ग्वालियर की मिट्टी से उपजे बड़े कांग्रेसी नेताओं में शुमार रहे हैं। सिंधिया जी ने तो 1982 में अटल बिहारी वाजपेयी को हराकर देश भर में रातों रात लोकप्रियता पा ली थी जबकि अटल जी के साथ स्वयं राजमाता जी खुद गली, चौराहों पर घूमी थीं पर उस दौर में कांग्रेस व इन्द्रा जी की लहर चल रही थी पर देखो आज में लहर गायब है। कांग्रेस ने गांधीवाद यदि त्यागा न होता सिर्फ सत्ता और सिर्फ सत्ता के लिये सामंतों राजा महाराजाओं को कांग्रेस के मंच न सौंपे होते तो आज ये न कहा जाता कि -एक थी कांग्रेस-
ज्योति बसु से भी सीखें
प्रधानमंत्री मोदी बातें भी करते हैं, संघ परिवार का कट्टरता फैलाने का एजेंडा भी 50 फीसद तक लागू कर रहे हैं। योगा व खेलों की बातें साथ-साथ कर रहे हैं व उत्तर प्रदेश में उन्हें एक पुजारी योगी को सत्ता सौंपनी पड़ी वरना संघ परिवार तो किसी ब्राम्हण को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपना चाहता था पर वहां मोदी ने संघ परिवार की नहीं सुनी। नतीजा हुआ नादानी नासमझी के चलते उत्तर प्रदेश का प्रशासन जो शुरू से ही यादव वाद के चलते मुलायम सिंह व अखिलेश ने अपने सियासत के चलते कानून कायदों से नीचे उतार दिया था तो निजाम और भी बर्बाद हो गया जो ”उन्नाव कांड“ करके उत्तर प्रदेश के छत्री मुख्यमंत्री योगी जी ने अपनी बिरादरी के सेंगर नामक विधायक को बचाने के लिये जो हथकंडे अपनाये उसका जवाब शायद संघपरिवार के पास नहीं है। मेरे एक मित्र झांसी निवासी डॉ. प्रमोद अग्रवाल पंश्चिम बंगाल कॉडर से 76 बैच के आय.ए.एस. रहे हैं ने मुझे 3 साल पहले बताया कि मैने कोलकत्ता में ज्योति बसु व चौधरी के साथ काम किया है। वहां के साठ फीसद नेता काफी ईमानदार हैं। वो सत्ता के लिये कुर्सी के लिये कानून कायदे तोड़ने नहीं देते। ज्योति बसु की ईमानदारी तो इतनी थी कि अपने खानसामा जो डाक बंगले या उनके दो कमरे वाले घर में खाना बनाकर खिलाते रहे थे उन्हें भी अंतिम दिनों तक परमानेंट नहीं करा सके थे। डॉ. अग्रवाल उस दौर में प्रमुख सचिव पी.डब्ल्यू.डी. थे। उन्होंने ज्योति बसु के अनुरोध पर मृत्यु से दो दिन पहले उस चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को स्थाई करने का आदेश निकलवाया था, ये चरित्र था ज्योति बसु का। कितने लोग उसके आधे से भी ईमानदार व पारदर्शी चरित्र रखते हैं सियासत में मध्य प्रदेश में तो एक सियासतदां मामा बनकर व्यापमं काण्ड में लाखों नौकरियां लूटकर बेच गया पर उसका अब तक कुछ नहीं हुआ। 40-50 लोग मारे जा चुके थे। इस कांड में क्या मुख्यमंत्री पद के इन महाशय पर मोदी अपनी सी.बी.आई. से कुछ कार्यवाही कराने की हिम्मत कर सकेंगे या फिर इन्दौर के बल्लामार विधायक की तरह सिर्फ कार्यवाही की घोषणा भर हो पायेगी। मोदी की लोकप्रियता बढ़ जायेगी यदि वो अपनी पार्टी के भी शिवराज व रमन सिंहों पर कार्यवाही कर जेल भेज देंगे। संघ परिवार शायद उन्हें रोक रहा होगा या फिर कोई अम्बानी अड़ानी शायद।

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