गरीबों को अपराधी बताने वालों पर कार्यवाही हो…!

नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश में लगातार गज़्ाब किया जा रहा है। दलितों आदिवासियों के लिये जारी योजनायें लागू करना तो दूर रहा उल्टे भील जाति के भाइयों को प्रदेश के एम.पी.पी.एस.सी. में पूछे गये सवालों में अपराधी बताया जा रहा है। अभी भी पी.एस.सी. वाले सरकार बदल गयी है ये शायद मानने को तैयार ही नहीं हैं। आदिम जाति मेहकमे के लोग ज्यादातर फर्जी बिल बनाकर पैसा लूटने में लगे हैं। उन पर कोई कड़ी कार्यवाही सरकार में बैठे बड़े नौकरशाह या मंत्री करने को तैयार ही नहीं हैं।
भील आदिवासियों की योजनायें प्रदेश में ठीक से लागू ही नहीं की जा रही हैं क्योंकि न तो नौकरशाही में इच्छाशक्ति है न ही सियासतदां इस पर शुरू से ध्यान देते आये हैं। नतीजों में मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बच्चे कुपोषण के कारण मारे जा रहे हैं। श्योपुर, झाबुआ आदि में इस तरह की घटनायें आये दिन हो रही हैं। महिला बाल विकास मेहकमे से लेकर आदिम जाति, अनुसूचित जाति मेहकमों के भारी भरकम बजट ठेकेदारों से मिलकर कागजों पर काम किया जा रहा है। ग्वालियर, भिण्ड, मुरैना आदि में फर्जी छात्रवृत्तियों की आड़ में करोड़ों का गबन लगातार हो रहा है। इन पर 2-3 सालों में भी पुलिस में रिपोर्टें तक नहीं की जा रही है।
उधर पिछड़ा वर्ग की तमाम योजनायें भी कागजों में चलाई जा रही हैं। उन पर भी सरकार को हमेशा ध्यान देना चाहिये। पिछड़े वर्ग के छात्रों ने भी हमें बताया कि छात्रवृत्तियों से लेकर अन्य सुविधायें भी उन्हें ही दी जा रही हैं, युवा लोग परेशान हैं। इसी तरह दूर दराज के सरकारी अस्पतालों की हालातें काफी खराब हैं, जहां दतिलों व पिछड़ों के 50-60 फीसद लोग ही इसकी सेवा लेने आते हैं। सरकारों को आर्थिक संकटों से भी दो-चार होना पड़ रहा है पर दलित व आदिवासियों के मेहकमों के आला अफसरान जो ए.सी.एस. जैसे बड़े पदों पर हैं प्रमुख सचिव रहे हैं वो गरीबों के लिये आबंटित पैसों में से कमीशन लेकर कराड़ों रुपये महिला मित्रों पर लुटाते देखे जा रहे हैं।
मेडीकल माफिया पर लगाम जरूरी
इस अंधेर गर्दी के चलते एक अच्छी खबर ये है कि प्रशासन की संवेदनशीलता व जनप्रतिनिधियों की जागरुकता के चलते ग्वालियर अंचल का गजराराजा मेडीकल कॉलेज के हालात कुछ बेहतर हो रहे हैं।
यहां मेडीकल माफिया से लेकर प्राईवेट डॉक्टरों के दलालों का राज कुछ कम कर दिया है वरना एक आम आदमी या महिला अगर कमलाराजा में इलाज के लिये आते थे। उनसे डॉक्टर्स के बरताव ठीक से न होने की आम खबरें चुनी जाती रही हैं। किसी प्रसव के लिये आने वाली प्रसूता से बाहर से एक-दो हजार का सामान मंगवाते रहे थे। कर्मचारियों का बरताव भी खराब रहता है। बात-बात पर जूनियर डॉक्टर्स हड़ताल पर चले जाते रहे थे पर अब ठीक है। वो अब पुरानी गलत आदतों में सुधार लाते देखे गये हैं। विधायक सक्रिय हैं, कमिश्नर्स व आला अफसर सक्रिय हैं। ये कमलनाथ सरकार की उपलब्धि कही जा सकती है। मरीज काफी राहत में हैं पर अभी भी के.आर.एच. व जे.ए. अस्पताल में सैकड़ों चूहों का आतंक मौजूद है। कभी-कभी मरीज पक्ष भी गलती कर बैठता है।
हटाये जायें कुछ डॉक्टर्स
ग्वालियर की मेडीकल सुविधायें पूरे उत्तरी मध्य प्रदेश बुन्देलखण्ड में बेहतर रही हैं पर मेडीकल माफिया ने सियासदां से मिलकर यहां के गरीब मरीजों को खूब लूटा रहा था। दवायें भी खूब बांटी जा रही हैं। दिल का इलाज भी काफी बेहतर करते दिखाई दे रहे हैं। डॉ. रस्तोगी साहब डीन की नियुक्ति यहां फौरन होनी चाहिये व ऐसे डॉक्टर्स फौरन हटायें जायें जो सरकारी अस्पताल पर ध्यान न देकर अपने निजी अस्पतालों पर ही ध्यान देते देखे जा रहे हैं। एक-एक गरीब महिला के परिवारजन से निजी अस्पताल में बच्चों के जन्म कराने के लिये 20-25 हजार वसूलते देखे जा रहे हैं। हर मामलों में ऑपरेशन करने का बहाना बनाकर। महिला चिकित्सक डॉ. मौर्या व डॉ. त्रिपाठी को मरीजों के लिये बेहतर काम करते देखा जरूर गया है।
0नईम कुरेशी
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