प्रोन्नति में आरक्षण संबंधी फैसले पर हंगामे का सच

अवधेश कुमार

उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रोन्नति में आरक्षण पर दिए गए फैसलों को लेकर राजनीतिक दलों का हल्लाबोल निश्चय ही चिंता पैदा करती है। चिंता इसलिए नहीं कि वे प्रोन्नति में आरक्षण का समर्थन करते हैं, बल्कि इसलिए कि शीर्ष न्यायालय के सम्मान का वे ध्यान नहीं रख रहे। आजकल सबसे प्रचलित विपक्षी नारा है, संविधान बचाओ और दूसरी ओर संविधान के अभिभावक तथा व्याख्याकर उच्चतम न्यायालय के फैसले पर ऐसी प्रतिक्रिया मानो किसी दुश्मन ने बहुत बड़ी क्षति पहुंचा दी है। नेता तो अपनी संकीर्ण राजनीतिक हित का ध्यान रखते हुए कोई भी बयान दे सकते हैं, लेकिन उच्चतम न्यायालय कोई फैसला देने के पहले उसके एक-एक पहलू की संवैधानिकता की जांच करता है, विरोधी एवं समर्थक दोनों पक्षों की सारी दलीलें सुनता है। इसलिए सामान्य व्यवहार न्यायपालिका के शीर्ष स्तंभ में सम्मान का होना चाहिए। अगर असमति है तो आप पुनर्विचार याचिका डाल सकते हैं। संसद को विधान बनानेका अधिकार तो है ही। जाहिर है, यह हल्लाबोल नेताओं की गैर जिम्मेवार चरित्र का प्रमाण है। सच कहा जाए तो अनुसूचित जाति/जनजाति तथा पिछड़ी जातियों का वोट पाने की लालच ने राजनीति को वहां पहुंचा दिया है जहां आप आरक्षण जैसे विषय पर विवेक और संतुलन से कोई बात तक नहीं कर सकते। राहुल गांधी कह रहे हैं आरएसएस और बीजेपी वाले कितना भी सपना देख लें हम आरक्षण को खत्म नहीं होने देंगे। आरएसएस न भाजपा ने कभी कहा है वो आरक्षण खत्म करने के पक्ष में है। तो फिर इस तरह के वक्तव्य को क्या कहा जा सकता है? बहरहाल, आइए यह देखें कि न्यायालय ने कहा क्या है और क्यों कहा है?

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने फैसले में लिखा है कि इस न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून के मद्देनजर इसमें कोई शक नहीं है कि राज्य सरकारें आरक्षण देने के लिए बाध्य नहीं है। ऐसा कोई मूल अधिकार नहीं है जिसके तहत कोई व्यक्ति पदोन्नति में आरक्षण का दावा करे।..न्यायालय राज्य सरकार को आरक्षण उपलब्ध कराने का निर्देश देने के लिए कोई परमादेश नहीं जारी कर सकता है। वह राज्य सरकारो को बाध्य नहीं कर सकता। उच्चतम न्यायालय की व्याख्या है कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) तथा 16 (4ए) में जो प्रावधान हैं, उसके तहत राज्य सरकार अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अभ्यर्थियों को प्रोन्नति में आरक्षण दे सकते हैं, लेकिन यह फैसला राज्य सरकारों का ही होगा। अगर वे (राज्य) अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करते है और पदोन्नति में आरक्षण देने का प्रावधान करते है तो सबसे पहले उसे इस तरह के आंकड़े इकट्ठा करने होंगे, जिससे यह स्पष्ट होता हो कि सार्वजनिक पदों पर किसी विशेष वर्ग का प्रतिनिधित्व कम है। उच्चतम न्यायालय ने इसमें 1992 के इंदिरा साहनी फैसले (मंडल आयोग की सिफारिश लागू करने पर फैसला) का हवाला देकर कहा है कि अनुच्छेद-16 (4) और अनुच्छेद-16 (4-ए) के तहत प्रावधान है कि राज्य सरकार आंकड़ा एकत्र करेगी और पता लगाएगी कि अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है क्योंकि आरक्षण के खिलाफ मामला उठने पर ऐसे आंकड़े अदालत में रखने होंगे, ताकि इसकी सही मंशा का पता चल सके। लेकिन ये आंकड़ा  राज्य सरकार द्वारा दिए गए आरक्षण को सही ठहराने के लिए होता है कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।  ये तब जरूरी नहीं है जब राज्य सरकार आरक्षण नहीं दे रही है। राज्य सरकार इसके लिए भी बाध्य नहीं है कि वह पता करे कि पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं।

तो संक्षेप में यह है पीठ का फैसला। न्यायालय को यह आदेश इसलिए देना पड़ा क्योंकि उत्तराखंड उच्च न्यायालय के 15 नवंबर 2019 के फैसले को चुनौती दी गई थी। उच्च न्यायालय ने फैसले में राज्य सरकार को सेवा कानून, 1994 की धारा 3(7) के तहत अनुसूचित जाति/जनजाति कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए कहा था, जबकि उत्तराखंड सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था। उत्तराखंड सरकार ने पांच सितंबर 2012 को लोक निमार्ण विभाग में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पदों पर प्रोन्नति में अनुसूचित जाति/जनजाति के कर्मचारियों को आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था। उत्तराखंड सरकार ने राज्य में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण उपलब्ध कराये बगैर सार्वजनिक सेवाओं में सभी पदों को भरे जाने का फैसला लिया गया था। राहुल गांधी और कांग्रेस से कोई पूछे कि उस समय उत्तराखंड मंे किसकी सरकार थी? वैसे उच्च न्यायालय ने भी राज्य सरकार से कहा था कि वह प्रोन्नति में आरक्षण देने के लिए ऐसे आंकड़े जुटाए जिससे पता चले कि इस श्रणी के लोगों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के दोनों फैसलों को निरस्त कर दिया है। उसने यह भी कहा है कि यह निर्धारित कानून है कि राज्य सरकार को सार्वजनिक पदों पर नियुक्तियों के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने के निर्देश नहीं दिये जा सकते है।

उच्चतम न्यायालय ने संविधान की धाराओं तथा पूर्व फैसले के आधार पर अपना फैसला दिया है। नेताओं की प्रतिक्रियाओं से ऐसा लग रहा है मानो न्यायालय अनसूचित जाति/जनजाति विरोधी हो। इस तरह का संदेश उच्चतम न्यायालय के बारे निकलना भविष्य के लिए खतरनाक होगा। हम उसके फैसले से सहमत-असहमत हो सकते हैं, पर प्रतिक्रिया बिल्कुल संयत होनी चाहिए खासकर शीर्ष नेताओं की। संसद में तो इस तरह का उच्चतम न्यायालय के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश तीनों स्तंभों के बीच संतुलन के सिद्धांत का ही उल्लंघन है। ध्यान रखिए , उच्चतम न्यायालय ने पहली बार ऐसा फैसला नहीं दिया। 26 सितंबर 2018 को भी पदोन्नति में आरक्षण के मामलों पर फैसला देते हुए उसने कहा था कि राज्य सरकारें चाहे तो वे पदोन्नति में आरक्षण दे सकती हैं। तब उच्चतम न्यायालय के सामने 2006 मेें अपने ही द्वारा दिए गए फैसले पर पुनर्विचार का मामला था। यह मामला मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ के पास था। 2006 के इस फैसले को एम नागराज फैसला कहा जाता है। इसमें उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ये आरक्षण तभी मिले जब सरकार संख्यात्मक आधार पर सिद्ध कर दे कि इस वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, उसका पिछड़ापन कायम है तथा इसे लागू करने पर सकल प्रशासनिक दक्षता प्रभावित नहीं होगी। न्यायालय ने उस फैसले को सही ठहराया था। बस, फैसले का वह भाग खत्म कर दिया जिसमें पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए संख्यात्मक आंकड़ा देने की शर्त तय की गई थीं। उच्चतम न्यायालय ने फैसले में साफ कहा था कि आरक्षण में 50 प्रतिशत की सीमा, क्रीमी लेयर सिद्धांत, पिछड़ापन, अपर्याप्त प्रतिनिधित्व व प्रशासनिक दक्षता संवैधानिक जरुरते हैं। इसके बगैर संविधान में दिए गए समानता का सिद्धांत ध्वस्त हो जाएगा। इस समय जो नेता सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं उन्हें याद दिलाना जरुरी है कि शीर्ष न्यायालय में केंद्र सरकार ने यह अर्जी भी दी थी कि अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति को आरक्षण दिए जाने में उनकी कुल आबादी पर विचार किया जाए।

पदोन्नति में आरक्षण हो या नहीं इस पर सामान्य आरक्षण से भी ज्यादा मतभेद हैं। 1995 में केन्द्र सरकार ने संविधान में 77 वां संशोधन कर अनुच्छेद 16 में 4 ए उपखंड जोड़ा। इसमें लिखा गया कि इस धारा में ऐसा कुछ नहीं है जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को राज्य के मातहत आने वाले किसी पद या श्रेणियों में वरियता के साथ प्रोन्नति में आरक्षण के लिए कोई प्रावधान बनाने से रोकता हो यदि राज्य के मत में उनका सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। बाद में वाजपेयी सरकार ने भी तीन संशोधन किए।  यूपीए सरकार ने इसके लिए कानून बनाने की कोशिश की। सितंबर 2012 में वह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया, लेकिन राज्य सभा ने इसे रोक दिया। इसमें जो संशोधन प्रस्तावित था उसमें भी वही बातें थीं जो धारा 16- 4 ए में थी।

अब जब उच्चतम न्यायालय ने फिर एक फैसला दे दिया है तो उस पर आग उगलने की जगह संयत होकर विचार किया जाना चाहिए। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से परे अगर पार्टियां रुख अपनाए तो रास्ता निकल सकता है। वैसे भी उच्चतम न्यायालय ने पदोन्नति में आरक्षण पर रोक तो लगाया नहीं है, राज्यों को स्वायत्त किया है। आरक्षण हमेशा से सरकारों की सोच का विषय रहा है। किंतु अगर कांग्रेस बंद का आह्वान करेगी, अनुसूचित जाति-जनजाति को सड़कों पर आने को भड़काया जाएगा तो फिर विवेकशील विमर्श की जगह नहीं रह जाएगी। कायदे से तो होना यही चाहिए कि आरक्षण पर किसी को नौकरी मिल गई तो उसके बाद वह अपनी दक्षता साबित करे और उसके आधार पर पदोन्नति हो या फिर कालबद्ध हो। ऐसा न करने से गैर आरक्षित श्रेणी के लोगों के अंदर निराशा एवं कुंठा पैदा होती है। जिनमें दक्षता है, योग्यता है उनके अंदर यह भाव घर जाता है कि हम कितना भी काम करें हमारी पदोन्नति तो तय समय अनुसार होगी लेकिन आरक्षण वाले हमसे पहले आगे बढ़ते चले जाएंगे। राजनीतिक पार्टियां अपना रुख तय करते समय इसका ध्यान रखती तो हंगामा होता ही नहीं। किंतु वोट बैंक जो न कराए।

अवधेश कुमार, इः30, गणेश नगर, पांडव नगर कॉम्प्लेक्स, दिल्लीः110092, दूरभाषः01122483408, 9811027208