म.प्र. में विधायकों की सक्रियता से प्रशासन बेचैन…!

नईम कुरेशी
मध्य प्रदेश हायकोर्ट की इन्दौर बैंच ने एक लोकप्रिय मजदूर नेता का असामाजिक तत्व बताकर जिलाबरद करने की कार्यवाही को न सिर्फ अवैध घोषित कर दिया बल्कि कलेक्टर व एस.पी. को मॉबलिचिंग न रोक पाने पर फटकार लगाते हुए सरकार पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया ये हालात है मध्य प्रदेश की नौकरशाही के। इसी तरह का हाल भिण्ड का भी रहा है जहाँ प्रशासन सियासतदां के दखल के चलते न्याय नहीं कर पा रहा है। यहां दोनों भारतीय जनता पार्टी व कांग्रेस के लोग मिल जुलकर खनिज लूट में शामिल हैं। प्रशासन दबाव बनाने पर किसी को भी जिलाबदर कर देता है। वहां भी पिछले माह कलेक्टर ने एस.पी. की रिपोर्ट पर एक नेता का बिना जरूरी अभिलेख के जिलाबदर कर दिया था जिसे हायकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने अवैध घोषित कर दिया था।
मध्य प्रदेश में सरकार जरूर बदल गयी है। 13 महीने भी हो चुके हैं फिर भी खनिज लूट रुक पाना संभव नहीं लग रहा है। लहार से लेकर डबरा तक का यही हाल है। इस क्षेत्र के लोकप्रिय विधायक व मंत्री डॉ. गोविन्द सिंह कहते रहे हैं कि डकैतों से भी ज्यादा लोगों की हत्यायें खनिज माफिया ने भा.ज.पा के राज के दौरान कर दी हैं जो सही भी लग रहा है। डॉ. गोविन्द सिंह चम्बल ग्वालियर के लोकप्रिय कांग्रेसी वजीर जरूर हैं। भिण्ड में अभी भी खनिज लूट जारी है। यहां के विधायक भी काफी सक्रिय हैं।
डॉ. गोविन्द सिंह ने सहकारिता मेहकमे में कुछ बड़े माफियाओं पर भी कार्यवाही करा दी हैं पर आमतौर पर मध्यप्रदेश में नौकरशाही पर किसी वजीर का या मुख्यमंत्री का रौब या दबाव दिखाई नहीं दे रहा है। दो-दो एकड़ के अंग्रेजों के दौर में बने सरकारी अफसरों के बंगलों में बैठ कर सूबे के आय.ए.एस व आय.पी.एस. अफसरान सिर्फ और सिर्फ अपनी नौकरी खानापूरी की तरह बजा रहे हैं। उन्हें ये देखने की फिक्र या परवाह नहीं है कि उनके कलेक्टर्स या पुलिस अधीक्षकगण जिलों में क्या कर रहे हैं। इसी तरह कलेक्टर्स व एस.पी. अपने डिप्टी कलेक्टर्स व डी.एस.पी. व थानेदारों को सही तरह से देख नहीं पा रहे हैं। जमीनी हकीकत देखने की उन्हें भी फुर्सत कहां है। दिन पर दिन पूरे सूबे में व मध्य प्रदेश के लगभग हर जिले में जमीनी सच्चाई ये है कि भले ही सैकड़ों सरकारी योजनायें प्रदेश व केन्द्र सरकारों ने चलाई हैं पर उनका पूरा लाभ आम जनता को नहीं मिल पा रहा है। सिर्फ सरकारी अस्पतालों में आधी दवायें जरूर मुफ्त मिल रही हैं फिर भी आधे अस्पतालों से डॉक्टर्स गायब रहने की खबरें कम नहीं हैं।
पुलिस प्रमुख व्ही.के. सिंह
प्रदेश भर में पुलिस मेहकमे के हालात कुछ ठीक नहीं हैं। विधायकों का सीधा प्रभाव थानों पर बढ़ गया है जिससे पुलिस के थानों में उन ही थानेदारों की नियुक्ति संभव हो पा रही है जो विधायकों से तालमेल बिठा पाने में सफल होते हैं। ग्वालियर के लश्कर के एक विधायक ने तो अपने क्षेत्र में अपनी ही बिरादरी के थानेदार को लगवा रखा है जबकि ये विधायक चन्द सैकड़ों से भी कम मतों से जीत पाये थे। इसी तरह का हाल भिण्ड, मुरैना, इन्दौर आदि में भी है। ऊपर से सूबाई सरकार पुलिस के मुखिया व्ही.के. सिंह को हटाने पर तुली है क्योंकि उन्होंने पुलिस आयुक्त बनाने की पैरवी जो कर दी थी। सिंह शांत रहने वाले अच्छे पुलिस ऑफिसर के तौर पर प्रदेश में जाने जाते हैं। म.प्र. के सियासतदां लगातार उत्तर प्रदेश की तर्ज पर पुलिस को अपने निजी स्वार्थों पर लगाने पर तुले हैं। अब आम जनता सिर्फ और सिर्फ हायकोर्टों पर ही निर्भर होने पर मजबूर है। आम जनता की वाजिब रिपोर्टें अब थानों में दर्ज नहीं हो पा रही हैं। 6-8 माह में हायकोर्ट के आदेशों पर रिपोर्ट दर्ज हो पाती हैं पर हायकोर्ट जाने के लिये समय व पैसा आम जनता के 5 फीसद लोग ही जुटा सकते हैं। म.प्र. तो अब तेजी से यू.पी. व बिहार की राह पर चलता दिख रहा है फिर भी अब इस दौर में विधायक काफी सक्रिय भी हैं। नौकरशाही उनके दबावों में काफी दिखाई दे रही है। मुरार के लोकप्रिय विधायक मुन्नालाल गोयल ने अपनी सक्रियता से मुरार नदी को मरने से बचा लिया। यहां प्रशासन की उदासीनता से आधी से ज्यादा नदी पर अतिक्रमण हो गया था। भू-माफिया ने यहां सैकड़ों प्लॉट्स काटकर लोगों को बसा दिया था। क्षेत्र में विधायकों की सक्रियता से प्रशासन जरूर बेचैन दिखाई दे रहा है। कलेक्टर, एस.पी. तक उनके साथ सड़कों पर घूमते दिखाई दे रहे हैं।
नईम कुरेशी
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